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आशुतोष आनंद अवस्थी, बस नाम ही काफी है, जानिए क्यों ऐसा कह रहे हैं हम…तो पढ़िए इसे

Report By: Abu Talha बाराबंकी। बाराबंकी के दरियाबाद ब्लॉक स्थित मियांगंज जूनियर हाईस्कूल के प्रभारी अध्यापक आशुतोष आनंद अवस्थी जिले के सैकड़ों शिक्षकों में अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहे और अब आज दूसरी बार राष्ट्रपति से सम्मानित होकर आशुतोष शिक्षा विभाग में नजीर बनेंगे। शिक्षा क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट कामों के लिए आशुतोष का […]

Report By: Abu Talha

बाराबंकी बाराबंकी के दरियाबाद ब्लॉक स्थित मियांगंज जूनियर हाईस्कूल के प्रभारी अध्यापक आशुतोष आनंद अवस्थी जिले के सैकड़ों शिक्षकों में अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहे और अब आज दूसरी बार राष्ट्रपति से सम्मानित होकर आशुतोष शिक्षा विभाग में नजीर बनेंगे। शिक्षा क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट कामों के लिए आशुतोष का चयन राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए हुआ है। पांच सितंबर को दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा। राष्ट्रपति पुरस्कार के लिये चयन से उत्साहित आशुतोष इस पुरस्कार को अपने विद्यालय के बच्चों को समर्पित कर रहे हैं।

आशुतोष ने बच्चों के शैक्षिक स्तर के साथ ही उनका बौद्धिक और सामाजिक स्तर सुधारने का प्रयास किया। इसमें वे सफल भी रहे। राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने से उत्साहित आशुतोष इस पुरस्कार को अपने विद्यालय के बच्चों को समर्पित कर रहे हैं। आशुतोष के पढ़ाने का तरीका ही उन्हें बाकी शिक्षकों से अलग बनाता है। आशुतोष अब अपने स्कूल की क्लास को प्रोजेक्टर, कंप्यूटर, रेडियो, लैपटॉप और मोबाइल से लैस कर चुके हैं। साल 2015 में भी आशुतोष को पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से राष्ट्रीय आईसीटी पुरस्कार मिला था। साल 2018 में उन्हें एक पुरस्कार राज्यपाल रामनाईक से भी मिल चुका है।

आशुतोष ने बताया कि इस समय उनके में स्कूल में 207 विद्यार्थी हैं। सबका जिम्मा अकेले शिक्षक आशुतोष और दो अनुदेशकों पर है। इसके बावजूद स्कूल में विद्यार्थियों की उपस्थिति 70 प्रतिशत से कम नहीं होती। उन्होंने बताया कि इससे पहले साल 2005 में वह कुशफर के विद्यालय में तैनात थे। साल 2015 में आशुतोष को राष्ट्रीय आईसीटी पुरस्कार पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से मिला था। साल 2018 में एक पुरस्कार राज्यपाल रामनाईक से मिल चुका है।

वहीं आशुतोष के स्कूल की अनुदेशक ज्योति सिंह के मुताबिक आशुतोष सर ने बच्चों के मन की पढ़कर समाधान तलाशा और आगे बढ़ते गए। धीरे-धीरे मेहनत रंग लाने लगी और स्कूल में बच्चों की उपस्थिति का प्रतिशत बढ़ने लगा।