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अमेठी के मंदिरों में मां दुर्गा हुई विराजमान, मां कालिका के मंदिर में लगी भक्तों की भीड़

Amethi: आज अश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि है।आज से शारदीय नवरात्र प्रारंभ हो रहा है। वैसे तो वर्ष भर में 4 नवरात्र पड़ते हैं। किंतु शारदीय नवरात्र तथा चैत्र नवरात्र का विशेष महत्व होता है। यह 9 दिन मां के पूजन अर्चन तथा उनकी भक्ति में लीन होने का दिन है। नवरात्रि के 9 […]

Amethi: आज अश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि है।आज से शारदीय नवरात्र प्रारंभ हो रहा है। वैसे तो वर्ष भर में 4 नवरात्र पड़ते हैं। किंतु शारदीय नवरात्र तथा चैत्र नवरात्र का विशेष महत्व होता है। यह 9 दिन मां के पूजन अर्चन तथा उनकी भक्ति में लीन होने का दिन है। नवरात्रि के 9 दिनों में मात्र के नौ रूपों का दर्शन एवं पूजन किया जाता है।

शारदीय नवरात्रि में हम अमेठी जनपद के प्रख्यात एवं विख्यात सुप्रसिद्ध मां कालिका जी के मंदिर का दर्शन करेंगे। यह बहुत ही प्राचीन मंदिर है। बताया जाता है कि – इस अति प्राचीन मंदिर का उल्लेख पुराणों में मिलता है। यहां पर वैसे तो प्रतिदिन हजारों की संख्या में लोग आते हैं और मां का दर्शन करते हैं। किंतु सप्ताह में प्रत्येक सोमवार को यहां पर भव्य मेला लगता है। जिसमें दूरदराज से लोग मां का दर्शन करने आते हैं।

फिर भी नवरात्र के 9 दिन की महिमा ही निराली है ।इन 9 दिनो में यहां पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं और मां का दर्शन पाते हैं। यहां पर बहुत ही दूर दूर से लोग आते हैं। मन्नते मानते हैं और मां उनकी मन्नतो को पूरा करती है।


महर्षि च्यवन की तपोस्थली के रूप में पुराणों में जिस स्थल का वर्णन किया गया है। वह स्थल संग्रामपुर का कालिकन क्षेत्र है। अमेठी शहर से 12 किलोमीटर दूर संग्रामपुर में स्थित एक अति प्राचीन मंदिर है। जिसे कालिकन धाम मन्दिर के नाम से जाना जाता है।  लोगों की मान्यता है कि – यहां मां के दर्शन मात्र से ही भक्तों की हर मुराद पूरी होती है। मान्यताओं के अनुसार, यहां के जंगलों में च्यवन मुनि का आश्रम था। कई दशक पहले की बात है।जब च्यवन मुनि तपस्या करते हुए इतने लीन हो गए कि उनके ऊपर दीमकों ने अपनी बांदी (दीमक जहां रहते हैं) बना दी।

उसी समय अयोध्या के राजा सरजा अपनी पूरी सेना और परिवार के साथ च्यवन मुनि के दर्शन के लिये उनके आश्रम पहुंचे। राजा की पुत्री सुकन्या अपनी साखियों के साथ आश्रम घूमने निकली थी। तभी उसने दीमक की बांदी में जुगनू की तरह जलते हुए दो छेद दिखाई दिए। राजकुमारी ने कौतुहल बस एक तिनका उठाया और छेद में चुभो दिया ।जिससें से खून निकलने लगा। खून निकलता देख राजकुमारी वहां से भाग निकली।

दीमक की बांदी के छेद में तिनका घुसने से च्यवन मुनि का ध्यान भंग हुआ तो उन्होंने श्राप दे दिया। जिससे राजा के सैनिकों में महामारी फैल गयी। राजा को जैसे ही पूरी हकीकत पता चली। उन्होंने आश्रम के सभी मुनियों से मिलकर च्यवन मुनि से माफ़ी मांगी।  सभी मुनियों ने निर्णय लिया कि राजा को अपनी राजकुमारी सुकन्या को च्यवन मुनि की सेवा के लिए छोड़कर जाना होगा।

राजा ने ऐसा ही किया, जिसके बाद उनकी पूरी प्रजा व सैनिक महामारी से ठीक हो गए। च्यवन मुनि की आंख को ठीक करने के लिए  देवताओं के वैद्य अश्वनी कुमार को बुलाया गया। जिन्होंने एक कुण्ड की स्थापना की। जिसमें च्यवन मुनि को स्नान करने से उनकी आंख ठीक हो गई, और वह युवावस्था में आ गए।

इसके बाद सभी लोग युवा बनने के लिए कुण्ड में स्नान करने की कोशिश करने लगे। इसको रोकने के लिए ब्रम्हा जी ने कुण्ड को बचाने के लिए देवी का आह्वान किया और कुण्ड की रक्षा के लिये निवेदन किया। तबसे देवी मां यहां विराजमान हैं और सबकी मनोकामना पूरी करती हैं।

Report- Arun Gupta