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मंजिले उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है’ पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है

संवाददाता- अरूण गुप्ता अमेठी। कहते हैं कि “मंजिले उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है’ पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है” मनुष्य की पहुंच से कुछ भी दूर नहीं है अगर वह चाह ले तो सब कुछ कर सकता है ऐसा ही एक दास्तां हम आपको अमेठी जिले […]

संवाददाता- अरूण गुप्ता

अमेठी। कहते हैं कि “मंजिले उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है’ पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है”

मनुष्य की पहुंच से कुछ भी दूर नहीं है अगर वह चाह ले तो सब कुछ कर सकता है ऐसा ही एक दास्तां हम आपको अमेठी जिले से बताने जा रहे हैं जहां पर अपने दोनों हाथों तथा दोनों पैरों से दिव्यांग व्यक्ति वह सब कुछ करता है जो एक आम इंसान को कर रहा होता है। दैनिक दिनचर्या से लेकर मोबाइल बनाना और यहाँ तक की पत्थर फेंककर आम तोड़ना तथा कुँए से पानी भरना शामिल है। इस दिव्यांग ने जीवन से हार नहीं मानते हुए प्रतिकूल आर्थिक स्थिति के बावजूद इस प्रथम श्रेणी में हाईस्कूल पास कर इस बार इंटरमीडिएट की परीक्षा दे रहा है। कहते हैं कि –

परिंदों को मंजिल मिलेगी यकीनन यह फैले हुए उनके पर बोलते हैं अक्सर वह लोग खामोश रहते हैं जमाने में जिनके हुनर बोलते हैं।

इसी संघर्ष और जुनून की हर स्विमर सिर्फ कोई स्विमर नहीं बल्कि जिंदगी के असली मायने के और फलसफे सिखाने वाले इस व्यक्ति ने जो तमाम शारीरिक विकलांगता ओं के बीच लोगों से कह रहे हैं की लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं हमने उस हाल में जीने की कसम खाई है। किसी शायर ने खूब कहा है।

आंधियों को जिद है जहां बिजलियां गिराने की मुझे भी जिद है वहीं आशियां बनाने की हिम्मत और हौसले बुलंद हैं खड़ा हूं अभी तक गिरा नहीं हूं अभी जंग बाकी है और मैं हारा भी नहीं हूं।

जो सफर इख्तियार करते हैं, वह मंजिलों को पार करते हैं। बस एक बार चलने का हौसला रखो मेरे दोस्त, ऐसे मुसाफिरों का तो रास्ते भी इंतजार करते हैं।। ऐसा ही एक दिव्यांग अमेठी जनपद की अमेठी तहसील एवं कोतवाली क्षेत्र के पिंडोरिया ग्राम सभा के करेहेंगी गांव के रहने वाले गरीब परिवार में जन्मे अमर बहादुर ने अपने हाथों पैरों की चिंता ना करते हुए सभी काम बखूबी निभा रहे हैं जो ऐसे लोगों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है जिनके पास दो हाथ और पैर पूरी तरह दुरुस्त हैं। या दिव्यांग अमर बहादुर घर से 3 किलोमीटर दूर श्री रणछोड़ इंटरमीडिएट कॉलेज श्री का पुरवा में इंटरमीडिएट का छात्र है यह प्रतिदिन स्कूल तो नहीं जा पाता है सप्ताह में एक-दो दिन स्कूल जरूर पहुंचता है और रहकर वहां पर पढ़ाई करता है इस बार यह इंटरमीडिएट की परीक्षा दे रहा है अमर बहादुर तीन भाइयों में सबसे छोटा है इसके दो भाई अलग रहते हैं उन से कोई लेना-देना नहीं है जबकि यह अपने माता पिता के साथ रहता है और माता-पिता किसी तरह से इसकी जरूरतों को पूरा करते हैं और यह खुद भी कुछ ना कुछ करके अपने खर्च तथा घर को चलाने का उपक्रम करता रहता है।

इस दिव्यांग को शासन प्रशासन तथा सरकार के स्तर पर कोई विशेष सुविधा भी नहीं मुहैया कराई गई है फिर भी यह अपने हौसलों और अपने जुनून में दिन-रात लगा रहता है। यहां तक कि इसके पास चलने के लिए ट्राई साइकिल भी नहीं है। ऐसे दिव्यांग के इरादे के लिए यह चंद लाइने ही काफी हैं कि –

मुश्किल इस दुनिया में कुछ भी नहीं, फिर भी लोग अपने इरादे बदल देते हैं। अगर सच्चे दिल से हो चाहत कुछ पाने की, तो रास्ते के पत्थर भी अपनी जगह छोड़ देते हैं।।

वहीं पर जब दिव्यांग अमर बहादुर से बात की गई तब अमर बहादुर ने बताया कि मेरे हाथ काम नही करता मैं सोंच रहा हूं हम पढ़ें और अपने जिले का नाम रोशन करें। घर की स्थित अच्छी नही है, पिता जी कुछ करते नही भाई हैं तो उनका अपना परिवार है। अमर बहादुर कहते हैं कि सरकार अगर मदद करे तो आगे भी बढ़ जाऊंगा। अमर बहादुर की खास बात ये है के वो मोबाइल मैकेनिक भी हैं, पैरों से मोबाइल खोलना और बनाना उनके लिए कोई मुश्किल नही है। इससे जो पैसे मिलते है उसे वो अपनी पढ़ाई में खर्च करता है।

ग्राम प्रधान प्रतिनिधि श्याम बहादुर सिंह बताते हैं कि अमर बहादुर काफी होनहार है। मोबाइल बनाने के साथ साथ बिजली का भी काम कर लेता है। इसके अलावा पढ़ने में भी तेज है। आर्थिक स्थित ठीक नही है। इनको प्रधानमंत्री आवास के साथ राशन कार्ड दिया गया है। मुख्यमंत्री आवास योजना में नाम भेजा गया है।

अमर बहादुर की मां केवला ने बताया कि बचपन से इसका हाथ ठीक नही है। पहले हम खिलाते थे अब अपने पैरों से खाता है। दुःख तो बहुत है लेकिन अगर कोई मदद हो जाती तो ठीक था। अगर कोई नौकरी मिल जाती तो ये आगे बढ़ जाता।